आत्मविश्लेषण
किसी से बदला लेने का भाव/विचार हमारे ही तन/मन पर विपरीत प्रभाव डालता है और हम स्वयं भी इस आग में जलने लगते हैं। इस प्रकार की जलन/व्याकुलता में दूसरों के साथ-साथ अपना भी नुकसान करने लगते हैं, जैसे तीली दूसरे को जलाने से पूर्व खुद जलती है। दूसरा कार्य/व्यवहार के लिए अन्तत: स्वयं उतरदायी होगा। दूसरे से ‘बदला लेने के भाव’ को महत्त्व देने के बजाय, हमें ‘स्वयं में बदलाव/समझ/आत्मविश्लेषण के मार्ग की ओर अग्रसरित करना ही श्रेयस्कर होगा। सहनशीलता और समत्व के शीतल जल से जितनी जल्दी हो सके इस आग को रोकना ही बुद्धिमत्ता है। बदले की भावना हमारे समय को ही नष्ट नहीं करती, अपितु हमारे स्वास्थ्य तक को चौपट कर जाती है। दुनिया को बदल पाना बड़ा मुश्किल/असम्भव है, इसलिए स्वयं को बदलने में ऊर्जा लगाना ही सुखी/सफल होने का एक मात्र उपाय है।
