मनीषियों ने कहा है –
दानं भोगो नाशस्तिस्रो गतयो भवंति वित्तस्य।
यो न ददाति न भुंक्ते तस्य तृतीया गतिर्भवति।।
धन की गतियां तीन हैं, दान -भोग अरु नाश।
दान-भोग जो ना करे, निश्चित हो विनाश ।
विचारक कहते हैं कि ‘धन की तीन स्थिति होती हैं, दान अर्थात् अच्छे काम के लिए परोपकार की भावना से दूसरों को देना, अपने काम में लेना जो ये दोनों काम नहीं करता उसकी संपत्ति नष्ट हो जाती है।”
यदि पुण्य के उदय से हमें धन मिला है तो परोपकार में उस धन को लगाना चाहिए, अपनी संपत्ति और साधन दूसरों के काम आ सकें ऐसा कार्य हमें करना चाहिए और हम अपनी सुख सुविधा के लिए भी उनका उपयोग करना चाहिए ।
जो व्यक्ति यह काम नहीं करता है उसकी संपत्ति नष्ट हो जाती है या उस व्यक्ति की आयु पूर्ण हो जाती है और वह सब संपत्ति छोड़ कर के चला जाता है ।
इसका मतलब हमें लोभ नहीं करना चाहिए/ लालच नहीं करना चाहिए । हमें जो कुछ मिला है वह अपने और दूसरों के उपयोग में लाना चाहिए। नहीं तो यह सब यहीं छूट जाएगा।
उदारता पूर्वक दूसरों का सहयोग करना और न्याय नीति पूर्वक उपभोग करना और सुखी रहना।”
