जैन धर्म के सिद्धांत


जैन धर्म के सिंद्धांत में ‘अहिंसा’ और ‘कर्म’ प्रमुख हैं। इनका मानना है कि जीवों पर हिंसा मत करो और जो जैसा कर्म करेगा उसको वैसा ही फल मलेगा। जैन धर्म के छः द्रव्य माने गए हैं जो इस प्रकार हैं – जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल। और इनके सात तत्वों को बताया गया है –

जीव – जैन धर्म में जीव से तात्पर्य ‘आत्मा’ से है जो चैतन्य है।

अजीव – इसे अचैतन्य माना गया है।

आस्रव – इसका मतलब पुद्गल कर्मों का आस्रव करने से है।

बंध – आत्मा से कर्म बंधन है।

संवर – इसका मतलब कर्म बंध को रोकने से है।

निर्जरा – इससे मतलब कर्मों को क्षय करने से है। जैनियों को अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह इन पांच व्रतों का पालन करना पड़ता है। ये व्रत श्रावक और मुनि दोनों को ही करने पड़ते हैं। जैन धर्म का सबसे पवित्र मन्त्र है –

मोक्ष – जीवन – मरण के चक्र से मुक्ति।

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