बड़े लोगों की विशेषता होती है कि जब वे कोई अच्छा काम करते हैं तो अपनी प्रशंसा खुद नहीं करते

इसरो का एक युवा वैज्ञानिक एक मिशन में लगा हुआ था। एक दिन वह हिम्मत जुटाकर अपने बॉस के केबिन में जा रहा था। उस वैज्ञानिक के बॉस थे डॉ. कलाम। बाद में डॉ. कलाम भारत के राष्ट्रपति बने थे।

युवा वैज्ञानिक ने अपने बॉस से कहा, ‘मैं आपसे एक छोटा सा निवेदन करना चाहता हूं। अभी काम अधिक है और इस वजह से हमें देर तक रुकना पड़ता है। मैंने अपने बच्चों से प्रॉमिस किया है कि मैं आज उन्हें प्रदर्शनी दिखाने ले जाऊंगा। अगर मुझे आज समय पर छुट्टी मिल जाए तो मैं ये काम कर लूंगा।’

डॉ. कलाम ने कहा, ‘ठीक है। चले जाना।’

इसके बाद वह युवा वैज्ञानिक अपने काम में लग गया। काम इतना अधिक था कि वह ये बात भूल गया कि उसे आज बच्चों के साथ प्रदर्शनी देखने जाना है। करीब तीन घंटे बाद उसकी नजर घड़ी पर पड़ी तो उस समझ आया कि बहुत देर हो गई है। वह दौड़कर डॉ. कलाम के केबिन में गया तो देखा कि वहां डॉ. कलाम नहीं हैं। वह बहुत दुखी हो गया था।

निराश होकर जब वह घर लौटा तो वहां का दृश्य देखकर हैरान हो गया। पत्नी अकेली थी। उस वैज्ञानिक ने पत्नी से पूछा कि बच्चे कहां हैं?

पत्नी ने जवाब दिया, ‘आपके बॉस डॉ. कलाम आए थे और वही बच्चों को प्रदर्शनी दिखाने ले गए हैं।’

ये सुनकर उस युवा वैज्ञानिक की आंखों में आंसू आ गए। पिता के रूप में भी और वैज्ञानिक के रूप में भी। उसने अपनी पत्नी से कहा, ‘कोई व्यक्ति बड़ा कैसे होता है, आज ये समझ आ गया है।’

उस समय शायद वह व्यक्ति नहीं जानता था कि डॉ. कलाम एक दिन भारत के राष्ट्रपति बनेंगे।

सीख

बड़े और विद्वान लोगों की विशेषता होती है कि वे जब कोई अच्छा काम करते हैं तो उसका ढिंढोरा नहीं पिटते हैं। वे सिर्फ अपना काम करते हैं। विद्वान व्यक्ति दूसरों की निजी जरूरतों को समझकर बिना कहे ही उनकी मदद करते हैं।

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