एक बहुत ही क्रोधी राजा था। वह बात बात पर गुस्सा हो जाता औऱ तुरंत सजा का ऐलान कर देता।
उसके सारे दरबारी औऱ नौकर चाकर उससे थर थर कांपते थे। सभी बस भगवान से यही मनाते कि उनसे क़भी कोई ग़लती न हो , नहीं तो राजा छोड़ेगा नहीं।
एक बार की बात है। राजा अपने राजमहल में ख़ूब आराम से बैठकर दिव्य भोजन कर रहा था ।
तभी अचानक खाना परोस रहे नौकर के हाथ से थोड़ी सी दाल राजा के कपड़ों पर छलक गई ।
नौकर डर के मारे कांपने लगा ।राजा के क्रोध की कोई सीमा न रही औऱ वह तुरंत आग बबूला हो गया।
जब नौकर ने साहस कर राजा के तरफ देखा तो वह थोड़ा घबराया लेकिन कुछ सोचकर उसने प्याले की बची सारी दाल भी राजा के कपड़ों पर उड़ेल दी ।
अब तो राजा के क्रोध की कोई सीमा न रही । उसने नौकर से चिल्लाकर कहा ‘ बेवकूफ…तुमने जान बूझकर ऐसी गुस्ताख़ी करने का दुस्साहस कैसे किया ,मौत का भी ख़ौफ़ नहीं तुमको ??
नौकर ने बेहद गंभीर भाव से उत्तर दिया…राजन, पहले जब आप पर बहुत थोड़ी सी दाल गिरी तो आपका गुस्सा देखकर मैनें समझ लिया था कि अब मेरी जान नहीं बचेगी लेकिन फिर मैंने सोचा कि लोग कहेंगे कि एक ताकतवर राजा ने एक मामूली गलती पर अपने एक बेगुनाह ग़रीब नौकर को मौत की सजा दे दी ।
ऐसे में आपकी ही बदनामी होती, तब मैनें सोचा कि सारी दाल ही उड़ेल दूं ताकि दुनिया आपको बदनाम न कर सके और मुझे ही अपराधी समझे ।
कम से कम आपके बारे में किसी को कुछ बोलने का मौका न मिले क्योंकि मेरे जीवित रहते कोई मेरे राजा के बारे में गलत बात बोले ,ये मुझें कतई बर्दाश्त नहीं होगा राजन।
राजा को उसके जबाव में एक गंभीर संदेश के दर्शन हुए और उसे अनुभव हुआ कि सेवा भाव कितना कठिन है, जो समर्पित भाव से सेवा करता है उससे कभी कभी गलती भी हो सकती है,
फिर चाहे वह सेवक हो, मित्र हो या फ़िर परिवार का ही कोई सदस्य । ऐसे समर्पित व वफ़ादार लोगों की गलतियों पर नाराज न होकर उनके प्रेम व समर्पण का सम्मान करना चाहिए।
शास्त्रों में भी कहा गया है कि क्षमा वीरों का आभूषण है अर्थात वीर,पराक्रमी औऱ समर्थवान व्यक्ति को हमेशा दयालु ही होना चाहिए।