गुरुपूर्णिमा महोत्सव

दूसरे सभी उत्सव तो हम मनाते हैं लेकिन “गुरुपूर्णिमा” हमें मनाती है…. जैसे माँ अपने बच्चे को मनाती है कि ‘इधर आ जा बेटा ! अब बहुत खेल लिया….मिट्टी में मैला हो गया….गंदगी लग गयी….अब नहा-धोकर स्वच्छ हो जा और मक्खन-मिश्री खा ले…..ऐसे ही यह पूर्णिमा कहती है कि ‘जन्मों-जन्मों से इधर-उधर घूमते हुए जीव ! अब तू अपने ठाकुर जी को प्राप्त कर ले….आ जा….अपने ज्ञान में आ जा….अपने जीवनदाता की ओर आ जा….।’

जैसे माँ अपने वात्सल्य से बालक को मनाकर स्वच्छ करके उसे पुष्ट करती है….ऐसे ही सद्गुरु भी हमें मनाकर हमारे अंतःकरण को स्वच्छ करके अमानित्व,अदंभित्व आदि सद्गुण भरके भक्ति-उपासना आदि का मार्गदर्शन देकर हमें सद्गुरु के अनुभव को पचाने की योग्यता प्रदान करने की कृपा करता है….।

हमारे मन में कभी तूफान चलता है….कभी संदेह आता है….कभी यह आता है….कभी वह आता है….। मन जब उद्विग्न हो, साधन-भजन से गिर गया हो अथवा कुसंग के कारण साधन-भजन छूट गया हो…..तो इस गुरुपूर्णिमा के महोत्सव पर हम और आप नया संकल्प करके फिर से चल सकते हैं….।

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