परिश्रम और ईमानदारी वो दो अंगुल हैं, जिनसे भगवान बंध जाते हैं

माता यशोदा और बालकृष्ण से जुड़ा किस्सा है। एक बार यशोदा कृष्ण के लिए माखन तैयार कर रही थीं। उसी समय कृष्ण को भूख लगी तो वे रोने लगे। वे धैर्य नहीं रख पाए। उन्होंने दही का मटका फोड़ दिया और अंदर जाकर बासी माखन खा लिया।

फूटा मटका देखकर माता यशोदा गुस्सा हो गईं और बालकृष्ण को मारने के लिए छड़ी उठाकर उनके पीछे दौड़ने लगीं। बहुत दौड़भाग करने के बाद यशोदा ने कृष्ण को पकड़ लिया। तभी कृष्ण रोने लगे। यशोदा को लगा कि लल्ला डर गया है तो छड़ी फेंक दी। सबक सिखाने के लिए यशोदा बालकृष्ण को बड़ी ओखली के साथ बांधने लगीं, लेकिन रस्सी दो अंगुल छोटी पड़ गई। तब माता ने दूसरी रस्सी जोड़कर कृष्ण को बांधने का प्रयास किया, लेकिन दूसरी बार भी रस्सी दो अंगुल छोटी पड़ गई।

यशोदा ने कई बार रस्सी जोड़कर कृष्ण को बांधने की कोशिश की, लेकिन कृष्ण बंध ही नहीं रहे थे। माता को परेशान देखकर श्रीकृष्ण ने सोचा कि अब मुझे बंध जाना चाहिए। माता परेशान हो रही हैं। इसके बाद कृष्ण रस्सी से बंध गए।

सीख – इस प्रसंग की सीख ये है कि भगवान अपने भक्तों से पर्याप्त परिश्रम करवाते हैं। और, तब पकड़ में आते हैं। यहां भगवान को पकड़ने का अर्थ ये है कि शिक्षा, सफलता, शांति, सुख-समृद्धि, ये सभी परमात्मा की कृपा से मिलते हैं। जब हम परिश्रम करते हैं, ईमानदार रहते हैं, सिर्फ तब ही हमें भगवान की कृपा मिलती है, सभी काम सफल हो सकते हैं। परिश्रम और ईमानदारी वो दो अंगुल हैं, जिनसे भगवान बंध जाते हैं।

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