राजा जनक बहुत विद्वान थे। लोग उन्हें देखकर आश्चर्य करते थे कि ये राजपाठ का आनंद लेते हैं और संयमित जीवन भी जीते हैं। जनक हमेशा कहा करते थे, ‘मन हमेशा मनुष्य को बांधता है। अगर हमने मन को काबू कर लिया तो आप राजपाठ का सुख भोगें या हिमालय में तप करें, आप अपना जीवन सही ढंग से जी सकते हैं।’
जब उनसे कोई सवाल पूछा जाता था तो उत्तर देने का उनका तरीका भी एकदम अलग ही होता था। एक दिन किसी ने उनसे पूछा, ‘मन को काबू कैसे किया जाए?’
राजा जनक उस समय पेड़ के नीचे खड़े हुए थे। उन्होंने हाथ उठाकर पेड़ की एक शाखा पकड़ ली। राजा बोले, ‘मैं आपके प्रश्न का उत्तर तब दे पाऊंगा, जब ये डाली मुझे छोड़ देगी।’
प्रश्न पूछने वाले ने कहा, ‘आप भी कमाल करते हैं, आपने डाली को पकड़ रखा है, डाली ने नहीं। इस डाली में तो प्राण भी नहीं हैं। ये आपको कैसे पकड़ सकती है?’
जनक बोले, ‘आपने बिल्कुल सही बात कही है। हमारा मन चैतन्य नहीं है। बिल्कुल डाली की तरह है। तो मन ने हमें नहीं, बल्कि हमने मन को पकड़ रखा है। हम ये मानकर चलते हैं कि हम मन की जकड़ में हैं। हमारे अंदर ये शक्ति है कि हम इस मन को छोड़ सकते हैं। जैसे इस डाली को मैं छोड़ सकता हूं। इस मन को हमने बनाया है।’
सीख – राजा जनक की ये बात हमें सीख दे रही है कि मन हमारे शरीर का कोई अंग नहीं है। हमारी याददाश्त, हमारे विचारों ने इसे तैयार किया है। इसके बाद हमने इसे पकड़ लिया है। इसीलिए दुख देने वाली यादों को और नकारात्मक विचारों को बार-बार सोचना नहीं चाहिए। जो लोग पुरानी बातें सोचते रहते हैं, वे हमेशा उलझे रहते हैं, अशांत रहते हैं। वर्तमान में हमें क्या काम करना है, उसके बारे में सोचना चाहिए। भविष्य की योजनाएं बनाएं, लेकिन बहुत ज्यादा सोचने से बचें, वरना मन बन जाएगा और हम अशांत हो जाएंगे।