पार्श्वनाथ प्रभु

पार्श्वनाथ प्रभु के 10 भव हुए। पूर्व भव में प्रभु की आत्मा प्राणत नाम के विमान में थी। वहाँ 20 सागरोपम का आयुष्य पूर्ण करके वहा रहेल मतिज्ञान , श्रुतज्ञान और अवधिज्ञान के साथ इक्ष्वाकुवंश के कश्यप गोत्र के काशी देश की वाराणसी नगरी के राजा अश्वसेन की वामादेवी राणी की कुक्षी में फागुन वद 4 के दिन तुला राशि और विशाखा नक्षत्र में मध्यरात्रि में च्यवन हुआ। तब माता ने 14 स्वप्न देखे।

प्रभु माता के गर्भ में 9 माह 6 दिन रहे। मार्गशीर्ष वद 10 के दिन विशाखा नक्षत्र में मध्यरात्रि में प्रभु का जन्म हुआ। छप्पनदिककुमारीओने आकार सूतीकर्म किया। बाद में 64 इन्द्रो ने मेरु पर्वत पर 1 करोड़ 60 लाख कलशों के साथ प्रभु का जन्माभिषेक महोत्सव किया। प्रातः काले प्रभु के पिता ने जन्महोत्सव मनाया।

प्रभु हर दिन 1 वर्ष तक 1 करोड़ 8 लाख सोनैया का दान देते है। दीक्षा के लिये वाराणसी नगरी में से दीक्षा का वरघोड़ा निकलता है। प्रभु विशाला शिबिका में बैठकर आश्रमपद वन में पधारते है। वहा अशोकवृक्ष के नीचे 5 मुष्ठी लोच करके अठ्ठम का तप करके 30 वर्ष की आयु में मार्गशीर्ष वद 11 के दिन तुला राशि और विशाखा नक्षत्र में 300
के साथ दीक्षा लेते है। तब प्रभु को चौथा मनपर्यवज्ञान होता है। दीक्षा के बाद कोकपट नगरी में वो भव या तीसरे भव के मोक्षगामी धन्य के हाथों दीक्षा के दूसरे दिन खीर से पारणा करते है।

प्रभु दीक्षा के बाद 84 दिन प्रमाद निंद्रा किये बिना आर्य अनार्य देश में विचरते वाराणसी नगरी में आश्रमपद उद्यान में अठ्ठम का तप करके घातकी वृक्ष के नीचे ध्यान में थे तब फागुन वद 4 के दिन विशाखा नक्षत्र में केवलज्ञान प्राप्त हुआ। लोकालोक के सर्व भावो को देखने और जाणने लगे। प्रभु 18 दोष से रहित हुए। 8 प्रातिहार्य और 34 अतिशय से युक्त हुए। तब देवोने आकर समवसरण की रचना की।

प्रभु विचरते विचरते समेतशिखर पधारते है। वहा मासक्षमण का तप करके कार्योत्सग मुद्रा में 33 मुनि के साथ श्रावण सुद 8 के दिन पूर्वरात को , तुला राशि विशाखा नक्षत्र में मोक्ष में गये। तब प्रभु का चारित्र पर्याय 70 वर्ष और 100 वर्ष का आयुष्य पूर्ण हुआ था।

प्रभु का शासन प्रायः 250 वर्ष तक चला था। प्रभु के शासन में 3 वर्ष के बाद मोक्ष का मार्ग शुरु हुआ था , जो 4 पुरुष परंपरा तक चला था। प्रभु के शासन में उत्तम पुरुष अबंड सत्यकी हुए। प्रभु के भक्त राजा प्रसेनजित थे। प्रभु के माता और पिता महेंन्द्र देवलोक में गये। पार्श्वनाथ प्रभु का लंछन सर्प है। प्रभु का वर्ण नील था। 9 धनुष्य की काया थी।

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