पूज्य- शरीर या गुण

एक बार एक द्वेषी मनुष्य ने अपने शिष्यों से कहा- “ये जैन मुनि कितने गन्दें रहते हैं। कभी नहाते नहीं। इनसे तो सदा दूर ही रहना चाहिये”। किसी जैन भाई ने यह सुना। वे उसके पास पहुंचे और बोले- “महानुभाव !गाय कभी नहाती नहीं है और भेंस सदा पानी में ही पड़ रहती है। बताइये, इन दोंनो में पवित्र कौन है? आप किसे पूज्य मानते हैं?” वास्तव में संगति करने के योग्य वह होते हैं, जिनका मन और जीवन पवित्र होता है। तन की पवित्रता से आत्मा का कोई संबंध नहीं है। मन चंगा तो कठोती में गंगा। बेचारा वह मनुष्य अब क्या जवाब दे!

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